Hamirpur Drone Case : 87 हजार के ड्रोन से 3.5 करोड़ की ग्रांट तक... फिर दावे पर क्यों लगा सवालिया निशान?
हमीरपुर के छात्र सर्वेश शर्मा को सेना के लिए ड्रोन विकसित करने के वास्ते आर्थिक सहायता मिलने की खबर का iDEX-DIO ने किया खंडन, दो महीने से प्रसारित हो रहा था दावा
Babushai Bureau
हमीरपुर: 29 October. 2026: हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर के एक छात्र की तकनीकी प्रतिभा की कहानी देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई। दावा था कि एक साधारण परिवार से आने वाले छात्र सर्वेश शर्मा ने महज 87 हजार रुपये की लागत से ड्रोन का प्रोटोटाइप तैयार किया और उनके इस नवाचार को भारतीय सेना के लिए विकसित करने के वास्ते 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मिल गई। खबर ने सुर्खियां बटोरीं। छात्र की उपलब्धि को आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा तकनीक की दिशा में बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया गया।
लेकिन अब इसी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बदल गया है। रक्षा क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहित करने वाली संस्था इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) और डिफेंस इनोवेशन ऑर्गेनाइजेशन (DIO) ने 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर होने के दावे को फर्जी बताया है। संस्था ने 28 अक्तूबर को सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि यह खबर पिछले करीब दो महीनों से प्रसारित हो रही थी, लेकिन ग्रांट मंजूर होने का दावा सही नहीं है। इस खुलासे के बाद अब सवाल केवल एक छात्र के प्रोजेक्ट का नहीं, बल्कि उस खबर की विश्वसनीयता का भी है, जिसे रक्षा क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया था।
87 हजार के प्रोटोटाइप से कैसे शुरू हुई चर्चा?
इससे पहले प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, राजकीय बहुतकनीकी संस्थान हमीरपुर, बड़ू में कंप्यूटर इंजीनियरिंग के पांचवें सेमेस्टर के छात्र सर्वेश शर्मा ने लगभग 87 हजार रुपये की लागत से ड्रोन का प्रोटोटाइप तैयार किया था। उनके प्रोजेक्ट को 'रुद्र एज टी-1 (स्पेक्ट्रा)' नाम से प्रचारित किया गया। रिपोर्टों में दावा किया गया कि ड्रोन को सीमा पर निगरानी के लिए विकसित करने की योजना थी। इसमें दुश्मन के रडार से बचने और जैमिंग के प्रभाव को झेलने जैसी क्षमताओं पर काम किए जाने की बात भी कही गई थी।प्रकाशित खबरों के अनुसार, सर्वेश की टीम ने आईआईटी जोधपुर और कोणार्क कोर से जुड़ी राष्ट्रीय स्तर की ओपन कार्डबोर्ड ड्रोन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। इसमें देश के करीब 50 संस्थानों की टीमों ने भाग लिया और सर्वेश की टीम को चौथा स्थान मिलने के साथ 10 लाख रुपये का पुरस्कार मिलने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद ही रक्षा क्षेत्र में ड्रोन विकसित करने की उनकी कहानी ने सुर्खियां बटोरीं। हालांकि, यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी प्रतियोगिता में पुरस्कार मिलना, ड्रोन का प्रोटोटाइप बनाना और रक्षा परियोजना के लिए करोड़ों रुपये की ग्रांट स्वीकृत होना तीन अलग-अलग बातें हैं।
कहां हुई सबसे बड़ी चूक?
सितंबर में प्रकाशित खबरों में दावा किया गया कि रक्षा मंत्रालय के तहत DIO और iDEX के माध्यम से सर्वेश के प्रोजेक्ट के लिए 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर हुई है। कुछ रिपोर्टों में परियोजना को आईआईटी रुड़की में आगे विकसित करने और करीब 20 महीने में पूरा करने का लक्ष्य भी बताया गया था। इन जानकारियों ने कहानी को एक बड़ी उपलब्धि का रूप दे दिया। लेकिन 28 अक्तूबर को iDEX-DIO के स्पष्टीकरण ने ग्रांट मंजूर होने के दावे पर ही सवाल खड़ा कर दिया। संस्था के मुताबिक, 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर होने की खबर फर्जी है। ऐसे में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पहले प्रकाशित खबरों में बताई गई परियोजना की लागत, फंडिंग, संस्थागत मंजूरी और भविष्य की योजनाओं को अब बिना स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि के स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। यह मामला पत्रकारिता और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली सूचनाओं के लिए भी एक सबक है। किसी उपलब्धि से जुड़ी जानकारी जितनी असाधारण हो, उसकी पुष्टि की जरूरत भी उतनी ही अधिक होती है।
साधारण परिवार के छात्र की कहानी ने क्यों खींचा ध्यान?
सर्वेश शर्मा हमीरपुर के बाहनवीं गांव के रहने वाले हैं। पहले प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, उनके पिता संजीव शर्मा दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और उनकी मां गृहिणी हैं। एक साधारण परिवार के विद्यार्थी द्वारा सीमित संसाधनों में तकनीकी प्रयोग करना अपने आप में प्रेरक विषय है। लेकिन किसी विद्यार्थी की वास्तविक मेहनत और उसकी उपलब्धियों को सामने लाने के लिए उस पर ऐसे दावों का बोझ डालना उचित नहीं, जिनकी पुष्टि न हुई हो। यहां मूल सवाल छात्र की प्रतिभा को खारिज करने का नहीं, बल्कि उपलब्धि और उससे जुड़े आर्थिक दावों को अलग-अलग देखने का है। ग्रांट के दावे का खंडन अपने आप में यह साबित नहीं करता कि छात्र ने ड्रोन का प्रोटोटाइप नहीं बनाया या उसका तकनीकी प्रयास निरर्थक था। इसी तरह प्रोटोटाइप बनाने की जानकारी को करोड़ों की रक्षा परियोजना की मंजूरी का प्रमाण भी नहीं माना जा सकता।
हादसे और ग्रांट विवाद को जोड़ना कितना सही?
इसी घटनाक्रम के बीच सर्वेश शर्मा के हॉस्टल से गिरकर घायल होने की खबर भी सामने आई। 28 अक्तूबर को हुई इस घटना के बाद उन्हें उपचार के लिए हमीरपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया और बेहतर उपचार के लिए पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किए जाने की जानकारी प्रकाशित हुई। पुलिस ने घटना की जांच शुरू की। शुरुआती रिपोर्टों में गिरने की परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग जानकारियां सामने आईं। पुलिस जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्र के साथ हुए हादसे और ड्रोन प्रोजेक्ट की फंडिंग से जुड़े विवाद के बीच किसी संबंध की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए दोनों घटनाओं को जोड़कर किसी साजिश, दबाव या अन्य कारण की कहानी बनाना तथ्यों से परे होगा।
अब किन सवालों के जवाब जरूरी?
इस पूरे प्रकरण में कुछ सवालों का आधिकारिक जवाब सामने आना जरूरी है।
- 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर होने का दावा सबसे पहले किस आधार पर सामने आया?
- क्या किसी स्तर पर आवेदन, चयन, अनुशंसा या परियोजना से जुड़ी बातचीत हुई थी, जिसे मंजूरी समझ लिया गया?
- प्रोटोटाइप की तकनीकी स्थिति और उसकी क्षमताओं का स्वतंत्र सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
- पहले प्रकाशित खबरों में बताई गई परियोजना की समयसीमा और आईआईटी रुड़की से जुड़ी जानकारी की आधिकारिक स्थिति क्या है?
इन सवालों का जवाब संबंधित संस्थाओं और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही सामने आना चाहिए। फिलहाल इस प्रकरण का सबसे बड़ा सबक यही है कि किसी प्रतिभा की कहानी को सुर्खियां देने की जल्दबाजी में तथ्यों की जांच पीछे नहीं छूटनी चाहिए। 87 हजार रुपये के प्रोटोटाइप की कहानी अपनी जगह है, लेकिन 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट की मंजूरी का दावा अब आधिकारिक खंडन के बाद विश्वसनीय तथ्य नहीं रह गया है। (SBP)
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