NLU Shimla Convocation: कमजोरों को न्याय, सरकार को आर्थिक बोझ, सीएम सुक्खू ने न्यायिक फैसलों पर उठाए सवाल
एनएलयू शिमला के दीक्षांत समारोह में बोले मुख्यमंत्री: न्याय व्यवस्था में जनहित और वित्तीय संसाधनों के बीच संतुलन जरूरी
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा, कानून के विद्यार्थी समाज के डॉक्टर और आर्किटेक्ट
बाबूशाही ब्यूरो
शिमला, 11 अक्तूबर 2026 : हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने न्यायिक फैसलों और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के बीच पैदा होने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जनहित, नियमों और राज्य की वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन बनाए रखना शासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में भर्ती नियमों में स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के बावजूद वित्तीय लाभ देने के न्यायिक निर्देशों से राज्य के राजकोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है। मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू), शिमला के तीसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य केवल कानूनी आदेश जारी करना नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों तक न्याय पहुंचाना, जरूरतमंदों की आवाज सुनना और प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है। वहीं, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने विधि स्नातकों को समाज के लिए सोशल इंजीनियर, सोशल डॉक्टर और सोशल आर्किटेक्ट की संज्ञा देते हुए उन्हें कानून के प्रति सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का संदेश दिया।
भर्ती नियमों से आगे वित्तीय लाभ का मुद्दा उठाया
मुख्यमंत्री सुक्खू ने अपने संबोधन में कहा कि कोई भी निर्वाचित सरकार अपने कर्मचारियों को उनके देय वित्तीय लाभों से वंचित नहीं रखना चाहती, लेकिन सरकार को राज्य के सीमित वित्तीय संसाधनों और राजकोषीय दायित्वों का भी ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जनहित में शुरू की गई योजनाओं और पहलों के क्रियान्वयन के दौरान कुछ न्यायिक निर्णयों से व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आती हैं।
मुख्यमंत्री ने वर्ष 2003 में अनुबंध कर्मचारियों को वरिष्ठता और वेतन वृद्धि का लाभ नहीं देने संबंधी निर्णय का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लगभग दो दशक बाद कुछ मामलों में भर्ती नियमों में स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के बावजूद वित्तीय लाभ प्रदान करने के निर्देश दिए गए, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ा।
उनके इस बयान ने न्यायिक निर्णयों, सरकारी नीतियों और राज्य की वित्तीय जवाबदेही के बीच संतुलन के सवाल को प्रमुखता से सामने रखा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि शासन की जिम्मेदारी केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के भीतर उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना भी है।
न्याय का मतलब कमजोर की आवाज सुनना
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में न्याय का दायरा केवल न्यायिक आदेशों तक सीमित नहीं है। निष्पक्षता, विवेकशीलता और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को समझना भी न्याय की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पहलू हैं। उन्होंने विधि की पढ़ाई पूरी करने वाले विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग समाज में न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए करें। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की सफलता का आकलन केवल उनकी व्यावसायिक उपलब्धियों और व्यक्तिगत तरक्की से नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान से भी किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को दृढ़ संकल्प, ईमानदारी और निरंतर प्रयास के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करने की सलाह दी। उन्होंने अपने शैक्षणिक जीवन का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से विधि की डिग्री हासिल की थी। हालांकि, उनकी प्राथमिक रुचि राजनीति में रही, लेकिन कानून की शिक्षा उनके राजनीतिक जीवन में भी उपयोगी साबित हुई।
पहाड़ी प्रदेश में खेल मैदानों के इस्तेमाल पर भी चर्चा
मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां खेल मैदानों के निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध करवाना बड़ी चुनौती है। ऐसे में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए स्कूलों और सामुदायिक खेल मैदानों के साझा उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पहली बार राज्य सरकार ने स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन के लिए पांच लाख रुपये की राशि का भुगतान किया। मुख्यमंत्री के अनुसार, उच्च न्यायालय ने एक सरकारी स्कूल के खेल मैदान के इस्तेमाल की अनुमति इस शर्त पर दी थी कि निर्धारित राशि का भुगतान किया जाए।
इस मुद्दे के माध्यम से उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और प्रशासनिक आवश्यकताओं के बीच तालमेल की जरूरत पर भी जोर दिया।
'कानून के विद्यार्थी सोशल इंजीनियर और सोशल डॉक्टर'
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने विधि स्नातकों को संबोधित करते हुए कहा कि समाज में कानून की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की भूमिका विशिष्ट होती है। उन्होंने कहा, 'लॉ के विद्यार्थी के रूप में आप दूसरों से अलग हैं। आप सोशल इंजीनियर, सोशल डॉक्टर और सोशल आर्किटेक्ट हैं।'
उन्होंने कहा कि कानून और न्याय के प्रति सम्मान केवल कानूनी प्रावधानों की सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रभावी न्याय व्यवस्था के लिए विषय का गहरा ज्ञान, न्याय की भावना और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता की सराहना करते हुए इसे धरती पर स्वर्ग के समान बताया। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग समाज की समस्याओं को समझने और उनके समाधान में योगदान देने के लिए करें।
एआई से बदलेगा कानूनी पेशे का स्वरूप
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने विधि स्नातकों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने की सलाह देते हुए कृत्रिम मेधा (एआई) सहित नई तकनीकों में विशेषज्ञता विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम मेधा का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा और कानूनी पेशा भी इससे अछूता नहीं रहेगा।
उन्होंने विद्यार्थियों से तकनीकी बदलावों को अपनाने, नई क्षमताएं विकसित करने और निरंतर सीखते रहने का आह्वान किया। उनके अनुसार, बदलते दौर में सफल होने के लिए केवल पारंपरिक कानूनी ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नई तकनीकों को समझना और उनके प्रभावी इस्तेमाल की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है।
विश्वविद्यालयों को सुविधाएं मजबूत करने का भरोसा
मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला में आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों, विद्यार्थियों और सरकार के सामूहिक प्रयासों से एनएलयू शिमला को विधि शिक्षा, अनुसंधान और अकादमिक उत्कृष्टता के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
उन्होंने न्यायपालिका को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि संविधान के तीनों अंगों का मूल उद्देश्य नागरिकों की सेवा करना और उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि देश के नागरिकों का संविधान और न्याय व्यवस्था में गहरा विश्वास है तथा इस विश्वास को बनाए रखना सभी संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
मेधावियों को स्वर्ण पदक, तीन हस्तियों को मानद उपाधि
दीक्षांत समारोह के दौरान मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया ने विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान कीं।
इस अवसर पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, त्रिपुरा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एस. रामचंद्र राव और झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान को डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। समारोह में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला की कुलपति डॉ. प्रीति सक्सेना, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। (SBP)
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