बिग ब्रेकिंग: चंडीगढ़ कोर्ट ने मोगा दंगा केस में डेरा सिरसा प्रेमियों को बरी किया
अशोक वर्मा
चंडीगढ़, 16 अक्टूबर, 2026: चंडीगढ़ की एक कोर्ट ने पंजाब में 2011 के मोगा बस जलाने और फायरिंग केस में गिरफ्तार किए गए डेरा सिरसा के 9 फॉलोअर्स के एक ग्रुप को बरी कर दिया है। एडिशनल सेशंस जज अरविंद कुमार की कोर्ट ने पंजाब से जुड़ा यह अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केस मोगा से चंडीगढ़ ट्रांसफर किया गया था। केस के दो आरोपियों, मोहिंदर पाल बिट्टू और प्रदीप सिंह की ट्रायल के दौरान मौत हो गई थी। बिट्टू की ट्रायल के दौरान नाभा जेल में हत्या कर दी गई थी और प्रदीप (2015 के बेअदबी मामलों में कथित तौर पर शामिल होने के लिए) की दिनदहाड़े एक दुकान के अंदर हत्या कर दी गई थी। बरी हुए लोगों में सुखजिंदर सिंह, शक्ति सिंह, रणदीप सिंह, बलजीत सिंह, निशान सिंह, रंजीत सिंह, नरिंदर शर्मा, संदीप सिंह और पिरथी सिंह शामिल हैं। इस केस में बचाव पक्ष की तरफ से वकील अमर डी कामरा, केवल सिंह बराड़ और हरीश छाबड़ा ने बहस की, जिनकी दलीलों के बाद चंडीगढ़ कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा। एडवोकेट केवल सिंह बराड़ ने बताया कि पुलिस ने यह केस करीब 15 साल पहले मोगा में हुई कथित हिंसा और भीड़ द्वारा PRTC बस में आग लगाने के आरोप में दर्ज किया था। शुरू में पुलिस ने 'अनट्रेस' रिपोर्ट फाइल की थी, लेकिन घटना के 7 साल बाद 10 जून 2018 को डेरा सच्चा सौदा की 45 मेंबर कमेटी के मेंबर महेंद्र पाल उर्फ बिट्टू की गिरफ्तारी दिखाई गई। उसके कथित खुलासे के बाद 11 लोगों के खिलाफ IPC, प्रिवेंशन ऑफ डैमेज टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट और आर्म्स एक्ट की अलग-अलग धाराओं के तहत चालान पेश किए गए थे।
सरकार के मुताबिक, 7 मार्च 2011 को दोपहर 3:10 बजे करीब 300 डेरा प्रेमी मोगा के कोटकपूरा बाईपास पर मौजूद नाम चर्चा घर में इकट्ठा हुए थे। उन्होंने हथियारों के बल पर ट्रैफिक रोक दिया और PRTC बस में तोड़फोड़ करके उसे आग लगा दी। इस मौके पर डेरा भक्तों ने सरकारी कर्मचारियों को अपनी ड्यूटी करने से रोकने के लिए बल का भी इस्तेमाल किया। बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि पुलिस ने आरोपियों को झूठा फंसाया है। उन्होंने दावा किया कि आरोपी फॉर्मल गिरफ्तारी की तारीख (9 जून, 2018 तक) से पहले ही पुलिस कस्टडी में थे, जबकि बिट्टू को हिमाचल से पहले ही कस्टडी में ले लिया गया था। उन्होंने कहा कि पुलिस ने इस पुरानी FIR को झूठे गवाहों और नकली डॉक्यूमेंट्स के आधार पर बेअदबी विवाद में उन्हें फंसाने के लिए एक मनगढ़ंत हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। कोर्ट ने दलीलें सुनने के बाद सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया।
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