CM सुक्खू की शुगर 177 बताई, फिर मशीन की जांच में क्या निकला?
एक जांच रिपोर्ट ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल? मुख्यमंत्री ने पुरानी मशीनों की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल, 10 से 15 साल पुराने उपकरण बदलने के निर्देश
Babushahi Bureau
शिमला: 30 October 2026 : सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचने वाला आम मरीज डॉक्टर की सलाह के साथ-साथ जांच रिपोर्ट पर भी भरोसा करता है। लेकिन अगर जांच करने वाली मशीन ही सही नतीजे न दे, तो मरीज के इलाज का आधार कितना भरोसेमंद रह जाएगा? हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के एक शुगर टेस्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने यही सवाल खड़ा कर दिया है। मामला शिमला में आयोजित एक स्वास्थ्य शिविर का है, जहां मुख्यमंत्री ने अपना ब्लड शुगर टेस्ट करवाया। जांच मशीन में उनका शुगर लेवल 177 दर्ज हुआ। मुख्यमंत्री ने इस रिपोर्ट पर संदेह जताया। उनका कहना था कि उन्हें पहले कभी शुगर की बीमारी नहीं रही। इसके बाद जांच उपकरण की सटीकता पर सवाल उठे और मशीन की कार्यप्रणाली की पड़ताल की गई। मुख्यमंत्री के इस अनुभव ने महज एक जांच रिपोर्ट को लेकर चर्चा नहीं छेड़ी, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में इस्तेमाल हो रहे उपकरणों की गुणवत्ता और रखरखाव की व्यवस्था पर भी ध्यान खींचा।
जब रिपोर्ट पर ही भरोसा नहीं, तो इलाज कैसे होगा?
मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के समक्ष चिंता जताई कि अस्पतालों में डॉक्टर मरीज की जांच रिपोर्ट के आधार पर उपचार की दिशा तय करते हैं। ऐसे में अगर मशीन गलत या असंगत परिणाम दे रही है, तो उसका असर सीधे मरीज के इलाज पर पड़ सकता है। मसलन, यदि किसी व्यक्ति की जांच रिपोर्ट में ब्लड शुगर सामान्य से अधिक दर्ज हो जाए, तो वह अनावश्यक तनाव में आ सकता है। उसे दोबारा जांच करवानी पड़ सकती है और अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ सकता है। गलत रिपोर्ट के आधार पर उपचार संबंधी निर्णय लेने की स्थिति भी चिंताजनक हो सकती है। हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि केवल 177 की एक शुगर रीडिंग के आधार पर न तो मशीन को गलत ठहराया जा सकता है और न ही डायबिटीज की पुष्टि होती है। जांच का समय, भोजन की स्थिति और टेस्ट का प्रकार भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। इस मामले में मशीन की रीडिंग में असंगतता सामने आने और उसके बदले जाने की जानकारी दी गई है।
मशीन बदल गई, लेकिन बड़ा सवाल बाकी
इस मामले में संबंधित चिकित्सकों ने जांच उपकरण की कार्यप्रणाली परखने के बाद बताया कि मशीन की रीडिंग में गड़बड़ी आ रही थी। इसके बाद मशीन बदल दी गई। लेकिन सवाल सिर्फ एक मशीन का नहीं है। अगर एक स्वास्थ्य शिविर में इस्तेमाल हो रहे उपकरण की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकता है, तो सरकारी अस्पतालों और छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में लगे दूसरे उपकरणों की नियमित जांच कितनी गंभीरता से हो रही है? मुख्यमंत्री ने भी इसी पहलू पर चिंता जताई। उनका कहना था कि यदि क्षेत्रीय अस्पतालों में ऐसी स्थिति है, तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में जांच सुविधाओं की स्थिति पर भी ध्यान देना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए कई बार यही स्वास्थ्य केंद्र उपचार का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सहारा होते हैं।
10 से 15 साल पुरानी मशीनों की होगी पहचान
स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने मेडिकल कॉलेजों और क्षेत्रीय अस्पतालों में इस्तेमाल हो रही पुरानी मशीनों को बदलने की दिशा में कदम उठाने के निर्देश दिए। उन्होंने 10 से 15 साल पुराने एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई उपकरणों की सूची तैयार करने को कहा, ताकि जरूरत के मुताबिक इन्हें बदलने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में जांच उपकरणों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। समय पर बीमारी की पहचान और सही उपचार के लिए मशीनों की गुणवत्ता के साथ उनका नियमित रखरखाव भी जरूरी है।
पांच मेडिकल कॉलेजों में बनेंगी आधुनिक ऑटोमेशन लैब
प्रदेश में जांच सुविधाओं को आधुनिक बनाने के लिए प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में ऑटोमेशन लैब स्थापित करने की योजना है। मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रत्येक लैब पर करीब 28 से 30 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। पहले चरण में आईजीएमसी शिमला, टांडा मेडिकल कॉलेज, चंबा, हमीरपुर और नेरचौक मेडिकल कॉलेज में यह सुविधा विकसित की जाएगी। आधुनिक लैब में जांच प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित और स्वचालित बनाने से रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में तेजी लाने तथा गुणवत्ता नियंत्रण को बेहतर करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, तकनीक के साथ प्रशिक्षित स्टाफ, नियमित कैलिब्रेशन और गुणवत्ता की निगरानी भी उतनी ही आवश्यक होगी।
डॉक्टरों के 300 पदों समेत भर्ती पर भी जोर
स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा के दौरान कर्मचारियों की कमी का मुद्दा भी उठा। बैठक में बताया गया कि मंत्रिमंडल ने 300 चिकित्सा अधिकारियों, 250 मल्टी टास्किंग स्टाफ, 200 स्टाफ नर्स और 76 ऑपरेशन थिएटर सहायकों के पद मंजूर किए हैं। इन पदों पर भर्ती प्रक्रिया जल्द पूरी करने की बात कही गई। मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस विद्यार्थियों को 60-60 के छोटे बैच में पढ़ाने के निर्देश भी दिए गए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से स्वास्थ्य संस्थानों की वास्तविक समस्याएं सामने रखने और जवाबदेही के साथ काम करने को कहा।
मुख्यमंत्री की शुगर जांच से सामने आया मामला एक मशीन की तकनीकी खामी से कहीं आगे का सवाल खड़ा करता है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में मरीजों का भरोसा केवल अस्पताल की इमारतों, डॉक्टरों की उपलब्धता या नई मशीनें लगाने से नहीं बनेगा। इसके लिए जांच की सटीकता, उपकरणों का रखरखाव, प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता और जवाबदेही भी जरूरी है। अब देखने वाली बात होगी कि पुरानी मशीनों की पहचान, उन्हें बदलने और आधुनिक लैब स्थापित करने की योजनाएं कितनी तेजी से जमीन पर उतरती हैं। क्योंकि आम मरीज के लिए सबसे अहम बात यही है कि उसकी बीमारी की पहचान सही हो और इलाज सही रिपोर्ट के आधार पर मिले। (SBP)
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