हिमाचल की इस पंचायत में शादी में फिजूलखर्ची की तो ₹51 हजार जुर्माना, 24 साल के प्रधान ने बदल डाली परंपरा
बाबूशाही ब्यूरो
नाहन: (सिरमौर) 27 सितंबर 2026: उम्र महज 24 साल, लेकिन पंचायत की कमान संभालते ही ऐसा फैसला लिया कि पूरे इलाके में चर्चा शुरू हो गई। सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की सखोली पंचायत के युवा प्रधान कमलेश चौहान ने शादियों में बढ़ते दिखावे और फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने के लिए विवाह समारोहों के लिए बाकायदा सामाजिक नियम तय कर दिए हैं। दुल्हन के गहनों से लेकर बारात में आने वाली गाड़ियों की संख्या तक सीमित कर दी गई है। इतना ही नहीं, नियम तोड़ने वाले परिवार पर 51 हजार रुपये का जुर्माना और पूरी पंचायत को सामूहिक भोज कराने का प्रावधान किया गया है।
24 साल की उम्र में ‘पुरानी परंपराओं’ पर सवाल
सखोली पंचायत के इस फैसले की सबसे दिलचस्प बात इसकी सख्ती ही नहीं, बल्कि इसके पीछे खड़ा युवा नेतृत्व है। महज 24 वर्ष की उम्र में प्रधान बने कमलेश चौहान ने शादी-ब्याह में बढ़ते खर्च को लेकर ऐसे समय में सवाल उठाया है, जब सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर परिवारों पर महंगे विवाह समारोह आयोजित करने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
पंचायत का फैसला सीधे तौर पर उन रस्मों और खर्चों को सीमित करने की कोशिश है, जिनका बोझ कई बार परिवारों की आर्थिक क्षमता से आगे निकल जाता है। यानी 24 साल के प्रधान का संदेश साफ है, शादी खुशी का मौका हो, आर्थिक दबाव और दिखावे की प्रतियोगिता नहीं।
सबसे ज्यादा चर्चा ₹51 हजार के जुर्माने की
पंचायत ने नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए 51 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया है। नियम तोड़ने वाले परिवार को जुर्माने के साथ पूरी पंचायत को सामूहिक भोज भी करवाना होगा।
इसके अलावा दुल्हन के आभूषण सीमित किए गए हैं।
बारात में अधिकतम 10 वाहन ही जा सकेंगे। महंगी ‘मामा’ रस्मों को सीमित किया गया है।
केवल सगा मामा शामिल होगा।
बकरा और महंगे उपहार देने जैसी परंपराओं पर रोक लगाई गई है। बुलडोज और ‘गेरू फेरनू’ जैसी रस्मों को बंद करने का निर्णय लिया गया है।सखोली पंचायत का यह फैसला केवल शादी के खर्च को कम करने का प्रयास नहीं, बल्कि उन सामाजिक दबावों पर भी सवाल है जिनके कारण परिवार कई बार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने को मजबूर होते हैं।
24 वर्षीय प्रधान का यह फैसला अब इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक युवा पंचायत नेतृत्व ने पुरानी परंपराओं को जस का तस स्वीकार करने के बजाय उनमें होने वाले खर्च और सामाजिक दबाव पर सवाल उठाया है। (SBP)
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