अब हिमाचल में भांग उगाएंगे किसान, लेकिन सरकार की शर्तों पर
भांग की नियंत्रित खेती की तैयारी तेज, किसानों को नर्सरी से मिलेगी पौध
कृषि विश्वविद्यालय ने कम नशीले बीज किए तैयार, औषधीय और वैध उपयोग के लिए विकसित की जा रही किस्म
बाबूशाही ब्यूरो
शिमला : 28 सितंबर 2026 : हिमाचल प्रदेश में भांग की नियंत्रित और औषधीय खेती को लेकर सरकार की तैयारियां अब अगले चरण में पहुंचने लगी हैं। प्रदेश में भांग की खेती को नशे के बजाय औषधीय और अन्य वैध उपयोगों से जोड़ने के लिए कृषि विश्वविद्यालय ने कम नशीले यानी ‘लैस टॉक्सिक’ भांग के बीज तैयार कर लिए हैं। अब इन बीजों से विश्वविद्यालय के खाली पड़े परिसर की भूमि में नर्सरी तैयार करने की योजना है। नर्सरी में तैयार पौध को प्रस्तावित कानूनी व्यवस्था और सरकार की ओर से तैयार की जाने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के तहत किसानों को उपलब्ध करवाया जाएगा।
सरकार की योजना शुरुआत में इस व्यवस्था को सीमित स्तर पर प्रयोग के तौर पर लागू करने की है। इसके तहत किसानों को अपनी ओर से अनियंत्रित तरीके से भांग की खेती करने के बजाय सरकार और संबंधित विभागों की निगरानी में निर्धारित किस्म की पौध उपलब्ध करवाई जाएगी। खेती के क्षेत्र, पौध की मात्रा, उत्पादन और इसके उपयोग से जुड़े नियम भी एसओपी के माध्यम से तय किए जाने प्रस्तावित हैं।
विदेश से मंगाए बीज से शुरू हुआ शोध
भांग की कम नशीली और उपयोगी किस्म विकसित करने की दिशा में कृषि विश्वविद्यालय ने पहले विदेश से बीज मंगवाए थे। इन बीजों पर विश्वविद्यालय स्तर पर शोध और परीक्षण के बाद पौध तैयार की गई। इसके बाद विश्वविद्यालय ने आगे बीज तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की और अब तैयार बीजों को अपने स्तर पर मल्टीप्लाई किया जा रहा है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य भविष्य में नियंत्रित खेती के लिए पर्याप्त मात्रा में बीज और पौध उपलब्ध करवाना है। विश्वविद्यालय स्तर पर बीजों का उत्पादन बढ़ने के बाद नर्सरी के माध्यम से किसानों को पौध उपलब्ध करवाने की व्यवस्था विकसित की जाएगी।
खाली जमीन पर तैयार होगी नर्सरी
कृषि विश्वविद्यालय ऐसे कैंपस या परिसर की खाली पड़ी भूमि का उपयोग नर्सरी तैयार करने के लिए करेगा, जो फिलहाल किसी अन्य कृषि गतिविधि में इस्तेमाल नहीं हो रही है। यहां नियंत्रित परिस्थितियों में तैयार होने वाली पौध को किसानों तक पहुंचाने से पहले निर्धारित नियमों के तहत निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था रखी जाएगी। इससे किसानों को प्रमाणित और निर्धारित किस्म की पौध उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी और खेती की पूरी प्रक्रिया को नियमन के दायरे में रखा जा सकेगा।
नशे के बजाय औषधीय उपयोग पर जोर
प्रस्तावित व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य भांग की खेती को नशीले पदार्थ के रूप में इस्तेमाल होने से अलग करते हुए औषधीय, औद्योगिक और अन्य वैध उपयोगों से जोड़ना है। कम नशीले तत्व वाली किस्मों पर काम इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भांग के पौधे के विभिन्न हिस्सों का इस्तेमाल औषधीय उत्पादों, फाइबर और अन्य औद्योगिक उत्पादों में किए जाने की संभावनाओं पर देश और दुनिया के कई हिस्सों में काम हो रहा है। हिमाचल में भी नियंत्रित खेती की संभावनाओं को देखते हुए सरकार इस क्षेत्र को नियमन के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है।
एसओपी तय करेगी खेती का पूरा ढांचा
किसानों को भांग की पौध उपलब्ध करवाने से पहले सरकार की ओर से एसओपी तैयार की जाएगी। इसी के आधार पर यह तय होगा कि कौन किसान खेती कर सकेगा, कितनी भूमि पर खेती की अनुमति होगी, कितनी पौध उपलब्ध करवाई जाएगी और फसल की निगरानी व खरीद की व्यवस्था किस तरह होगी।
उत्पादन के बाद फसल के इस्तेमाल और उसके अंतिम गंतव्य को भी नियमों के दायरे में रखने की व्यवस्था प्रस्तावित है, ताकि नियंत्रित खेती के नाम पर उत्पाद का अवैध इस्तेमाल न हो।
पहले सीमित स्तर पर प्रयोग
भांग की नियंत्रित खेती की व्यवस्था को प्रदेश में शुरुआत में बड़े पैमाने पर लागू करने के बजाय पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सीमित क्षेत्र में शुरू किए जाने की तैयारी है। प्रयोग के दौरान फसल की गुणवत्ता, कम नशीले तत्व वाली किस्मों का प्रदर्शन, किसानों की आय और निगरानी व्यवस्था समेत विभिन्न पहलुओं का आकलन किया जा सकता है।
यदि प्रारंभिक स्तर पर व्यवस्था सफल रहती है तो भविष्य में इसके दायरे को बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि इसके लिए कानूनी प्रावधान, लाइसेंसिंग, निगरानी और उत्पाद के वैध उपयोग की स्पष्ट व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी।
किसानों के लिए नई आय का विकल्प बनने की संभावना
नियंत्रित और वैध खेती की व्यवस्था लागू होने पर भांग की खेती पारंपरिक कृषि के साथ किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकती है। खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां अन्य फसलों की खेती की संभावनाएं सीमित हैं, वहां औषधीय या औद्योगिक उपयोग वाली फसलों के रूप में इसकी संभावनाएं तलाशने की योजना है।
फिलहाल पूरा मॉडल सरकार की प्रस्तावित कानूनी व्यवस्था और एसओपी पर निर्भर करेगा। कृषि विश्वविद्यालय की ओर से बीज तैयार करने और नर्सरी विकसित करने की तैयारी को इस पूरी प्रक्रिया का शुरुआती चरण माना जा रहा है।
क्या बदलेगा:
-किसानों को सीधे अनियंत्रित बीज के बजाय निर्धारित किस्म की पौध उपलब्ध कराने की व्यवस्था।
-खेती सरकार की निगरानी और एसओपी के तहत होगी।
शुरुआत में सीमित क्षेत्र में प्रयोग किया जाएगा।
-कम नशीले तत्व वाली किस्मों के औषधीय और वैध उपयोग पर फोकस रहेगा।
-कृषि विश्वविद्यालय बीज उत्पादन और पौध तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाएगा। (SBP)
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