राज्य के समान नागरिक संहिताओं के अंतर्गत लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण
चंडीगढ़ः अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत संवैधानिक चिंताएँ लिव-इन संबंधों को जेल की सज़ा के डर के साथ राज्य के पास पंजीकृत कराना कुछ लोगों की सुरक्षा करता है, लेकिन इससे कहीं अधिक लोगों की निजता में हस्तक्षेप होता है। सुरक्षा के उपाय जेल की धमकी के बिना भी बनाए रखे जा सकते हैं। 1. सुरक्षा कवच से निगरानी चौकी तक लंबे समय तक भारतीय कानून ने अविवाहित जोड़ों के साथ रहने के मामले में नरम रुख अपनाया। एस. खुशबू बनाम कन्नियाम्मल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक ही घर में साथ रहने वाले दो वयस्क कोई अपराध नहीं करते। कानून मुख्य रूप से तब हस्तक्षेप करता था, जब संबंध समाप्त हो जाता था। अदालतें लंबे समय तक साथ रहने के आधार पर विवाह होने की धारणा बना सकती थीं, अपने साथी द्वारा छोड़ दी गई महिलाओं को भरण-पोषण माँगने की अनुमति देती थीं और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम को उन संबंधों पर भी लागू मानती थीं, जो विवाह के स्वरूप के समान हों। इस प्रकार, राज्य पहले से हस्तक्षेप नहीं करता था, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सहायता के लिए आगे आता था। वह एक सुरक्षा कवच था, निगरानी की चौकी नहीं। अब इस व्यवस्था को बदला जा रहा है। उत्तराखंड की वर्ष 2024 की समान नागरिक संहिता ( —) पहली ऐसी संहिता थी, जिसने लिव-इन संबंध में रहने वाले साथियों के लिए एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार को सूचना देना अनिवार्य किया और ऐसा न करने को अपराध माना। इसके बाद गुजरात का कदम आया। वहाँ की विधानसभा ने मार्च 2026 में एक संहिता पारित की, राष्ट्रपति ने 17 सितंबर को अपनी मंजूरी दी और अधिनियम को 1 अक्टूबर को राजपत्र में प्रकाशित किया गया। हालाँकि, इसे लागू करने की तारीख घोषित नहीं की गई है। असम में भी इसी प्रकार का विधेयक पेश किया गया है। इस प्रकार, कानून का एक समान प्रारूप उभरता हुआ दिखाई दे रहा है। 2. वास्तव में क्या बदलाव हो रहा है? यह बदलाव केवल एक अतिरिक्त फॉर्म भरने तक सीमित नहीं है। पहले, राज्य किसी जोड़े की परेशानी या आवश्यकता सामने आने पर प्रतिक्रिया देता था। अब संबंध तब तक कानून की नजर में अदृश्य रहने का जोखिम उठाता है, जब तक उसका पंजीकरण न हो जाए। पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक की जेल या जुर्माना हो सकता है। व्यवहार में, यह व्यवस्था समस्या का समाधान करने से हटकर नियमों का अनिवार्य पालन कराने की ओर बढ़ती है। पहले निजी संबंधों को तब तक स्वतंत्र छोड़ा जाता था, जब तक उनमें कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती थी। अब उन संबंधों को पहले से ही राज्य के सामने घोषित करना आवश्यक हो जाता है। 3. कानून बनाने वालों के पक्ष में तर्क इन कानूनों के पीछे मौजूद उद्देश्यों को भी निष्पक्षता से समझना आवश्यक है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को नाजायज होने का कलंक नहीं झेलना चाहिए। जिस महिला को उसका साथी बिना आर्थिक सहायता के छोड़ दे, उसे भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए। पंजीकरण का रिकॉर्ड यह पुष्टि करने में मदद कर सकता है कि दोनों में से कोई भी पहले से विवाहित नहीं है और दोनों के बीच कानून द्वारा निषिद्ध निकट संबंध नहीं है। अनौपचारिक संबंधों में अपने साथी पर आर्थिक रूप से निर्भर महिलाओं को संबंध टूटने पर वास्तविक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इसलिए, राज्य का इन लोगों की सुरक्षा में रुचि लेना पूरी तरह वैध और उचित उद्देश्य है। 4. जहाँ कानून की रूपरेखा विफल होती है पृष्ठ 1आपत्ति इन कानूनों के उद्देश्यों पर नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने के तरीकों पर है। (क) समय-सीमा चूकने पर जेल विवाह का पंजीकरण न कराने पर जुर्माना लगाया जाता है। इसके विपरीत, साथ रहने की सूचना देर से देने को ऐसा अपराध मानना, जिसके लिए जेल हो सकती है, अनुपातहीन है। अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता के सिद्धांत के आधार पर इन दोनों व्यवस्थाओं में अंतर को उचित ठहराना कठिन है। (ख) पुलिस को बिना सीमाओं के जानकारी उपलब्ध कराना पंजीकरण का विवरण स्थानीय पुलिस थाने को भेज दिया जाता है, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट उद्देश्य, जानकारी तक पहुँचने पर कोई प्रतिबंध और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की कोई निश्चित अवधि निर्धारित नहीं है। ऐसे रिकॉर्ड का दुरुपयोग हो सकता है, जिसमें स्वयंभू निगरानी समूहों और विरोधी परिवारों द्वारा दुरुपयोग भी शामिल है। (ग) वयस्कों के माता-पिता को सूचना देना 18 से 21 वर्ष की आयु के साथियों के माता-पिता को सूचना देना सर्वोच्च न्यायालय के उस बार-बार दोहराए गए दृष्टिकोण से मेल नहीं खाता, जिसके अनुसार वयस्कों को अपना जीवनसाथी या साथी चुनने की स्वतंत्रता है। लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और शफीन जहाँ बनाम अशोकन के.एम. जैसे मामलों में इस स्वतंत्रता को मान्यता दी गई है। (घ) केवल महिलाओं को ही उपचार और सहायता का अधिकार भरण-पोषण का अधिकार केवल महिलाओं को उपलब्ध है। पुरुष, ट्रांसजेंडर व्यक्ति और समान-लिंग वाले साथी, जो समान रूप से असुरक्षित परिस्थितियों में हो सकते हैं, इस व्यवस्था से बाहर रह जाते हैं। इससे संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के अंतर्गत समानता से संबंधित प्रश्न उत्पन्न होते हैं। (ङ) रजिस्ट्रार को अनियंत्रित शक्तियाँ देना रजिस्ट्रार इस व्यवस्था में एक ऐसे द्वारपाल की भूमिका निभाने लगता है, जो यह तय करता है कि किसी संबंध को पंजीकरण की अनुमति मिलेगी या नहीं। लेकिन इस प्रक्रिया में निष्पक्षता के बुनियादी तत्वों का अभाव है, जैसे: संबंधित पक्ष को पूर्व सूचना देना। पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देना। निर्णय के लिखित कारण बताना। शीघ्र अपील की व्यवस्था उपलब्ध कराना। 5. संवैधानिक प्रश्न पहला प्रश्न: क्या कोई राज्य विवाह और उत्तराधिकार जैसे विषयों के इतने निकट विषय पर कानून बना सकता है और ऐसे निवासियों पर भी उसे लागू कर सकता है, जो उस राज्य से बाहर रहते हैं? दूसरा प्रश्न: क्या अनिवार्य पंजीकरण, सूचना देने की बाध्यता और पुलिस को जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार से संबंधित पुट्टस्वामी मामले में निर्धारित कसौटी पर खरी उतरती है? इस कसौटी के अनुसार किसी हस्तक्षेप के लिए तीन आवश्यक शर्तें हैं: वैधता (): हस्तक्षेप का कानूनी आधार होना चाहिए। वैध उद्देश्य ( ): हस्तक्षेप का उद्देश्य उचित और वैध होना चाहिए। आनुपातिकता (): उठाया गया कदम उद्देश्य की तुलना में आवश्यकता से अधिक कठोर नहीं होना चाहिए। तीसरा प्रश्न: क्या दंडात्मक प्रावधान और लिंग-विशिष्ट व्यवस्थाएँ संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 द्वारा दी गई समानता की गारंटी पर खरी उतरती हैं? वर्तमान में उपलब्ध जानकारी के आधार पर, इन कानूनों के सुरक्षात्मक उद्देश्यों का समर्थन किया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें लागू करने के कई तरीकों का नहीं। पृष्ठ 26. अन्य लोकतांत्रिक देशों में क्या व्यवस्था है? अन्य देशों में साथ रहने वाले जोड़ों के संबंधों का पंजीकरण सामान्यतः स्वैच्छिक होता है। इसके लिए जोड़ों को प्रोत्साहित किया जाता है और पंजीकरण के माध्यम से उन्हें उत्तराधिकार, कर तथा संपत्ति संबंधी अधिकारों जैसे लाभ मिल सकते हैं। वहाँ पंजीकरण आम तौर पर अनिवार्य नहीं होता और न ही पंजीकरण न कराने पर दंड दिया जाता है। अर्थात, जोड़ों को रजिस्टर में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, मजबूर नहीं किया जाता। 7. आगे का बेहतर रास्ता विधायिकाएँ लोगों के निजी संबंधों की निगरानी किए बिना भी असुरक्षित व्यक्तियों की रक्षा कर सकती हैं। इसके लिए चार सुधार किए जा सकते हैं। 1. जेल के स्थान पर नागरिक दंड पंजीकरण न कराने पर जेल की सजा के बजाय नागरिक प्रकृति के परिणाम निर्धारित किए जाएँ, जैसे मामूली जुर्माना या कुछ वैधानिक लाभों का सीमित नुकसान। 2. बच्चों की वैध स्थिति और भरण-पोषण को पंजीकरण से स्वतंत्र रखना बच्चों की वैध स्थिति और भरण-पोषण के अधिकार पंजीकरण पर निर्भर नहीं होने चाहिए। इससे उन लोगों को नुकसान नहीं होगा, जिनकी रक्षा के लिए कानून बनाया गया है, केवल इसलिए कि उनके साथी ने पंजीकरण नहीं कराया। 3. पुलिस की पहुँच पर न्यायालय का नियंत्रण पुलिस को पंजीकरण के रिकॉर्ड तक पहुँच केवल न्यायालय के आदेश के आधार पर दी जानी चाहिए। इसके साथ जानकारी के उपयोग पर स्पष्ट सीमाएँ और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की निश्चित अवधि भी निर्धारित होनी चाहिए। 4. रजिस्ट्रार की प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना रजिस्ट्रार की प्रक्रिया में पूर्व सूचना, सुनवाई का अवसर, निर्णय के लिखित कारण और शीघ्र अपील की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, भरण-पोषण का अधिकार केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए और वयस्कों के माता-पिता को सूचना देने की बाध्यता समाप्त की जानी चाहिए। 8. निष्कर्ष यदि राज्य किसी ऐसे साथी या बच्चे की रक्षा करना चाहता है, जिसे उसके हाल पर छोड़ दिया गया है, तो वह अपना कर्तव्य निभा रहा है। लेकिन यदि राज्य प्रेम संबंध को रजिस्ट्रार के सामने साबित करना अनिवार्य कर देता है और ऐसा न करने पर जेल की धमकी देता है, तो वह कुछ अलग ही कर रहा है। पंजीकरण ऐसा दरवाजा होना चाहिए, जो सुरक्षा और अधिकारों तक पहुँच खोले, न कि ऐसा जाल जिसमें फँसने का खतरा हो। गुजरात का अधिनियम अभी लागू नहीं हुआ है। इसलिए व्यवस्था में सुधार करने का अवसर अभी भी मौजूद है। मूल लेख का नोट वर्ष 2026 में बनाए गए कानूनों के प्रावधानों से संबंधित जानकारी समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। प्रकाशन से पहले राजपत्र में प्रकाशित आधिकारिक कानूनी पाठ से इनकी पुष्टि की जानी चाहिए। इन कानूनों के क्रियान्वयन से संबंधित आँकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए यह लेख व्यवहार में इन कानूनों के संचालन के बारे में कोई निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करता।
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Babli Khetwal,
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