हिमाचल में फटने को तैयार ‘वाटर बम’! 10 साल में 30% तक बढ़ीं नौ ग्लेशियल झीलें, 15 से ज्यादा पुल और आबादी खतरे की जद में
आईआईटी मंडी के दशकभर के शोध ने बढ़ाई चिंता, सैटेलाइट तस्वीरों से सामने आया झीलों के लगातार फैलने का खतरनाक सच
बाबूशाही ब्यूरो
मंडी : 05 सितंबर 2026: हिमालय में बढ़ता तापमान अब सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पहाड़ों की ऊंचाइयों पर मौजूद ग्लेशियल झीलें भी तेजी से फैल रही हैं। हिमाचल प्रदेश में ऐसी नौ ग्लेशियल झीलें लगातार आकार बढ़ा रही हैं। पिछले करीब 10 वर्षों के अध्ययन में इनके क्षेत्रफल और संख्या में 30 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। अगर इनमें से किसी झील की प्राकृतिक बांध जैसी संरचना टूटी और अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहा, तो यह निचले क्षेत्रों में तबाही का कारण बन सकता है।
नेपाल में ग्लेशियल झील फटने से हुई तबाही के बाद आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने हिमाचल की ऐसी झीलों का विस्तृत अध्ययन किया। सैटेलाइट इमेजरी और अन्य स्रोतों से जुटाए गए करीब एक दशक के डाटा के विश्लेषण में झीलों के लगातार विस्तार का चिंताजनक तथ्य सामने आया है।
शोध के अनुसार, इन ग्लेशियल झीलों से संभावित बाढ़ की स्थिति में 15 से अधिक पुलों के अलावा कई गांवों की आबादी तथा शिक्षण और स्वास्थ्य संस्थानों पर खतरा पैदा हो सकता है।
हिमाचल की इन नौ झीलों पर नजर
शोध में चंबा और लाहौल की सीमा तथा आसपास के हिमालयी क्षेत्र में स्थित कालीकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुरई, क्या त्सो, योचे, समुद्रा टापू, कासंगा और गेपांग गाथ जैसी ग्लेशियल झीलों को अध्ययन में शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और झीलों में पानी का स्तर बढ़ने से इनका खतरा भी बढ़ रहा है। यही वजह है कि इन झीलों को संभावित ‘वाटर बम’ के रूप में देखा जा रहा है।
गेपांग गाथ का क्षेत्रफल 2.44 लाख वर्ग मीटर बढ़ा
शोधकर्ता प्रो. डॉ. डेरिक्स पी. शुक्ला के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने के कारण कई झीलों के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
इतना बढ़ा झीलों का दायरा
- गेपांग गाथ झील का क्षेत्रफल करीब 2.44 लाख वर्ग मीटर बढ़ा है।
- कासंगा झील में करीब 1.50 लाख वर्ग मीटर की वृद्धि हुई।
- कालीकुंड झील का क्षेत्रफल करीब 1.20 लाख वर्ग मीटर बढ़ा है।
शोधकर्ताओं के अनुसार कालीकुंड और कासंगा जैसी झीलों की भौगोलिक परिस्थितियां इन्हें अधिक संवेदनशील बनाती हैं। कालीकुंड झील की ढलान अपेक्षाकृत अधिक खड़ी होने के कारण इसके आसपास संभावित जल निकासी की स्थिति विशेष चिंता का विषय है।
हिमालय में बढ़ रही ग्लेशियल झीलों की संख्या
प्रो. शुक्ला के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इनकी संख्या अब करीब 2,000 तक पहुंच गई है। हिमाचल भी इस बदलाव से अछूता नहीं है।
प्रदेश में फिलहाल चार ग्लेशियल झीलों को संवेदनशील जोन में रखा गया है, लेकिन शोध में सामने आए झीलों के विस्तार को देखते हुए भविष्य में जोखिम वाले क्षेत्रों की संख्या बढ़ सकती है।
झील फटी तो नीचे के इलाकों में आ सकता है सैलाब
ग्लेशियल झीलों के आसपास बर्फ, मलबे और चट्टानों से बनी प्राकृतिक बांध जैसी संरचनाएं होती हैं। यदि इनमें दरार पड़ती है या ये अचानक टूटती हैं तो झील का पानी बेहद तेजी से नीचे की ओर बह सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
ऐसी स्थिति में ऊंचाई से अचानक आने वाला पानी अपने रास्ते में आने वाले पुलों, सड़कों, गांवों और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
आईआईटी मंडी का यह दशकभर का अध्ययन हिमाचल के लिए स्पष्ट चेतावनी है कि ग्लेशियरों का पिघलना सिर्फ बर्फ का कम होना नहीं, बल्कि पहाड़ों की ऊंचाइयों पर ऐसे ‘वाटर बम’ तैयार होना भी है, जिनका विस्फोट निचले क्षेत्रों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। (SBP)
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