गुरदेव सिंह कुलार—वह ओलंपिक चैंपियन, जिसने भारतीय हॉकी में रचा इतिहास
सुखमिंदर भंगू
लुधियाना, 02 अक्तूबर,2026ः 12 अगस्त 1933 को जालंधर के प्रसिद्ध हॉकी गांव संसारपुर में जन्मे गुरदेव सिंह कुलार उस दौर की उपज थे, जब पंजाब में हॉकी महज एक खेल नहीं, बल्कि जुनून, परंपरा और जीवन का हिस्सा हुआ करती थी।
संसारपुर ने भारत को अनेक अंतरराष्ट्रीय और ओलंपिक हॉकी खिलाड़ी दिए हैं और इस गौरवशाली परंपरा में गुरदेव सिंह कुलार का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है।
परिवार से मिला हॉकी का विरसा
गुरदेव सिंह के पिता सूबेदार ठाकुर सिंह स्वयं भारतीय सेना की हॉकी टीम के सदस्य रहे थे। वर्ष 1926 में उन्होंने भारतीय सेना की हॉकी टीम के साथ न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का ऐतिहासिक दौरा किया था।
इस तरह गुरदेव सिंह को हॉकी की प्रेरणा और खेल का माहौल परिवार से ही मिला।
उन्होंने कैंटोनमेंट हाई स्कूल, जालंधर से शिक्षा प्राप्त की और विद्यार्थी जीवन में ही हॉकी में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। वर्ष 1956 में उन्होंने पोलैंड में आयोजित विश्व युवा महोत्सव में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।
मेलबर्न 1956—करियर का स्वर्णिम अध्याय
गुरदेव सिंह कुलार के करियर का सबसे चमकदार अध्याय 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में लिखा गया।
उन्होंने भारतीय टीम में इनसाइड-राइट की भूमिका निभाई। फाइनल में भारत ने पाकिस्तान को 1-0 से हराकर लगातार छठा ओलंपिक हॉकी स्वर्ण पदक जीता।
गुरदेव सिंह ने मेलबर्न में अपने पहले ही मुकाबले में अफगानिस्तान के खिलाफ दो गोल किए। भारत ने यह मैच 14-0 से जीता। इसके बाद अमेरिका के खिलाफ अगले मैच में उन्होंने तीन गोल किए।
गुरदेव सिंह, उदम सिंह और महान बलबीर सिंह सीनियर की भारतीय अग्रिम पंक्ति ने टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया। इस तिकड़ी ने मिलकर भारत के 38 में से 24 गोलों में योगदान दिया।
एशियाई खेलों में भी चमका सितारा
गुरदेव सिंह 1958 टोक्यो एशियाई खेलों में भारतीय टीम का हिस्सा रहे, जहां भारत ने रजत पदक जीता।
इसके बाद 1962 जकार्ता एशियाई खेलों में उन्हें भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी सौंपी गई। उनकी कप्तानी में भारत ने एक बार फिर रजत पदक हासिल किया।
इस तरह उनके अंतरराष्ट्रीय पदकों में एक ओलंपिक स्वर्ण और दो एशियाई खेलों के रजत पदक शामिल रहे। इसके साथ ही उन्हें भारतीय टीम की कप्तानी करने का गौरव भी प्राप्त हुआ।
पंजाब पुलिस की वर्दी में भी हॉकी का परचम
गुरदेव सिंह 1956 में पंजाब पुलिस में शामिल हुए और 1967 तक पंजाब पुलिस तथा पंजाब की टीमों के लिए खेलते रहे।
घरेलू हॉकी में भी उनकी उपलब्धियां शानदार रहीं। 1962 में भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप में उनकी कप्तानी में पंजाब ने स्वर्ण पदक जीता। पंजाब ने 1965 में भी खिताब अपने नाम किया, जबकि 1961, 1963 और 1964 में कांस्य पदक हासिल किए।
पंजाब पुलिस की टीम के साथ भी उन्होंने कई बड़ी सफलताएं हासिल कीं। पंजाब पुलिस ने 1956, 1959, 1961, 1962, 1964 और 1966 के ऑल इंडिया पुलिस गेम्स में स्वर्ण पदक जीते और कुलार इन अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे।
1966 बीटन कप उनके करियर का एक यादगार पड़ाव था। पंजाब पुलिस ने प्रतिष्ठित खिताब जीता और फाइनल में गुरदेव सिंह ने सिग्नल्स के खिलाफ निर्णायक गोल किया।
भारत से इंग्लैंड तक हॉकी का साथ
1961 में गुरदेव सिंह ने इंडियन वांडरर्स हॉकी टीम के साथ न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया। यह उनके अंतरराष्ट्रीय हॉकी जीवन की महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक था।
यहां उनके करियर को लेकर एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। उपलब्ध हॉकी रिकॉर्ड के अनुसार गुरदेव सिंह ने 1962 में अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लिया, लेकिन पंजाब पुलिस और पंजाब की टीमों के लिए 1967 तक खेलते रहे।
1967 में वह ब्रिटेन चले गए। इंग्लैंड पहुंचने के बाद भी हॉकी उनके जीवन का अहम हिस्सा बनी रही। उन्होंने लीड्स क्षेत्र में Airedale Hockey Club और Bingley Hockey Club के लिए हॉकी खेली।
खिलाड़ी ही नहीं, मार्गदर्शक भी
गुरदेव सिंह के खेल विकास में पारिवारिक हॉकी विरासत के साथ-साथ जालंधर और पंजाब के मजबूत हॉकी माहौल की भी बड़ी भूमिका थी।
उनका महान हॉकी खिलाड़ी और कोच ध्यानचंद के साथ भी खेल संपर्क रहा। 1950 के दशक के अंतिम वर्षों और 1960 के शुरुआती वर्षों में ध्यानचंद भारतीय हॉकी में कोचिंग और चयन से जुड़ी भूमिकाओं में थे तथा गुरदेव सिंह के साथ उनकी कई मुलाकातें हुईं।
हालांकि उपलब्ध विश्वसनीय रिकॉर्ड किसी एक व्यक्ति को गुरदेव सिंह का निजी “मुख्य कोच” साबित नहीं करते। इसलिए बिना ठोस दस्तावेजी प्रमाण के किसी व्यक्ति को उनका निजी कोच बताना उचित नहीं होगा।
सीमित संसाधनों के बावजूद रचा इतिहास
आज खिलाड़ियों के पास आधुनिक एस्ट्रोटर्फ, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, फिटनेस विशेषज्ञ और खेल विज्ञान की सुविधाएं मौजूद हैं। गुरदेव सिंह का दौर इससे बिल्कुल अलग था।
सीमित संसाधनों, प्राकृतिक मैदानों और कम सुविधाओं के बावजूद उन्होंने विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—अनुशासन, कड़ी मेहनत, टीम भावना और संसारपुर की समृद्ध हॉकी परंपरा।
एक ओलंपिक स्वर्ण, दो एशियाई रजत और उपलब्धियों की लंबी सूची
गुरदेव सिंह कुलार की प्रमुख उपलब्धियां:
- 1956 मेलबर्न ओलंपिक — स्वर्ण पदक
- 1958 टोक्यो एशियाई खेल — रजत पदक
- 1962 जकार्ता एशियाई खेल — रजत पदक और भारतीय टीम के कप्तान
- 1962 राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप — पंजाब के कप्तान के रूप में स्वर्ण
- 1965 राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप — पंजाब चैंपियन
- ऑल इंडिया पुलिस गेम्स — 1956, 1959, 1961, 1962, 1964 और 1966 में स्वर्ण
- 1966 बीटन कप — पंजाब पुलिस चैंपियन; फाइनल में निर्णायक गोल
- 1956 विश्व युवा महोत्सव, पोलैंड — भारत का प्रतिनिधित्व
- 1961 इंडियन वांडरर्स टीम — न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया दौरा
मौत नहीं, एक युग का अंत
8 फरवरी 2024 को इंग्लैंड के लीड्स में 90 वर्ष की आयु में गुरदेव सिंह कुलार का निधन हुआ।
उनके निधन के साथ भारतीय हॉकी के उस स्वर्णिम दौर की एक और जीवंत कड़ी टूट गई, जब भारत विश्व हॉकी की प्रमुख शक्तियों में शुमार था।
लेकिन गुरदेव सिंह कुलार की कहानी आज भी संसारपुर की गलियों, पंजाब के हॉकी मैदानों और भारत के ओलंपिक इतिहास में जीवित है।
मेलबर्न का ओलंपिक स्वर्ण, जकार्ता में भारतीय टीम की कप्तानी, बीटन कप का निर्णायक गोल और पंजाब पुलिस के लिए वर्षों की सेवाएं उन्हें सिर्फ एक महान खिलाड़ी नहीं, बल्कि भारतीय हॉकी के स्वर्णिम युग का एक अमर नाम बनाती हैं।
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