पंजाब के बास्केटबॉल ओलंपियन — तरलोक सिंह संधू
1980 के मॉस्को ओलंपिक में भारत की ऐतिहासिक टीम का हिस्सा बनकर रचा अमिट अध्याय
सुखमिंदर भंगू
लुधियाना, 12 अक्तूबर,2026ः पंजाब की धरती ने हॉकी, कुश्ती, एथलेटिक्स और कबड्डी के साथ-साथ बास्केटबॉल में भी देश को ऐसे खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करके खेल इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। इन प्रतिष्ठित खिलाड़ियों में ओलंपियन तरलोक सिंह संधू का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल एक बास्केटबॉल खिलाड़ी होना नहीं है, बल्कि उस भारतीय पुरुष बास्केटबॉल टीम का हिस्सा बनना है, जिसने 1980 के मॉस्को ओलंपिक खेलों में भाग लिया था। यह भारतीय पुरुष बास्केटबॉल टीम की पहली और अब तक की एकमात्र ओलंपिक भागीदारी है।तरलोक सिंह संधू का जन्म 1 जनवरी 1955 को हुआ था और उनकी लंबाई 193 सेंटीमीटर, यानी लगभग 6 फुट 4 इंच दर्ज है। उन्होंने 1980 के मॉस्को ओलंपिक में भारतीय पुरुष बास्केटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व किया।
193 सेंटीमीटर की लंबाई बास्केटबॉल के लिए उनकी शारीरिक बनावट को स्वाभाविक रूप से अनुकूल बनाती थी। लेकिन केवल लंबाई किसी खिलाड़ी को ओलंपिक तक नहीं पहुंचाती। इस स्तर तक पहुंचने के लिए प्रतिभा के साथ लंबे समय का प्रशिक्षण, प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव और राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छा प्रदर्शन आवश्यक होता है।1980 के मॉस्को ओलंपिक भारतीय बास्केटबॉल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। भारतीय टीम में तरलोक सिंह संधू के साथ बलदेव सिंह, अजमेर सिंह, परवेज दीनियार, दिलीप गुरुमूर्ति, हरभजन सिंह, जोरावर सिंह, अमरनाथ नागराजन, प्रमदीप सिंह, परमजीत सिंह, राधे श्याम और हनुमान सिंह शामिल थे। टीम के कोच राजन मैक्कोलाथ थे।
प्रारंभिक दौर में भारत का सामना मेजबान सोवियत संघ, चेकोस्लोवाकिया और ब्राजील जैसी मजबूत टीमों से हुआ। इसके बाद भारतीय टीम ने वर्गीकरण दौर के मुकाबलों में भी हिस्सा लिया और अंततः टूर्नामेंट में 12वां स्थान हासिल किया।हालांकि भारत पदक नहीं जीत सका, लेकिन ओलंपिक बास्केटबॉल प्रतियोगिता तक पहुंचना ही भारतीय बास्केटबॉल के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
1980 के मॉस्को ओलंपिक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, तरलोक सिंह संधू ने भारत के सभी सात मैचों में हिस्सा लिया। उन्होंने कुल 12 अंक बनाए, नौ रिबाउंड और एक असिस्ट दर्ज किया। उनका फील्ड-गोल रिकॉर्ड 22 प्रयासों में पांच सफल शॉट का रहा, जबकि उन्होंने तीन में से दो फ्री थ्रो सफलतापूर्वक किए। विस्तृत आंकड़ों के अनुसार, उनके नाम शून्य स्टी और एक टर्नओवर दर्ज है।
ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह केवल टीम की सूची में शामिल खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि उन्होंने ओलंपिक मुकाबलों में मैदान पर उतरकर भागीदारी भी की।1980 के मॉस्को ओलंपिक के बाद से भारतीय पुरुष बास्केटबॉल टीम दोबारा ओलंपिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी। इस कारण तरलोक सिंह संधू और उनके साथियों की उपलब्धि का ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है।
FIBA के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में भी 1980 को भारतीय पुरुष बास्केटबॉल टीम की पहली और अब तक की एकमात्र ओलंपिक भागीदारी के रूप में दर्ज किया गया है।इस दृष्टि से तरलोक सिंह संधू का नाम भारतीय बास्केटबॉल के सबसे विशिष्ट ऐतिहासिक अध्यायों में से एक से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।प्रतिस्पर्धात्मक बास्केटबॉल से दूर होने के बाद भी संधू ने खेल जगत से अपना रिश्ता बनाए रखा। विभिन्न खेल आयोजनों में उनकी उपस्थिति और युवा खिलाड़ियों के साथ उनकी भागीदारी दर्शाती है कि उनके लिए ओलंपिक का अनुभव केवल अतीत की याद बनकर नहीं रह गया।
उन्हें विभिन्न शैक्षणिक और खेल आयोजनों में ओलंपियन के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है। वर्ष 2013 में एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज के अंतर्गत आयोजित एक नॉर्थ जोन इंटर-यूनिवर्सिटी बास्केटबॉल टूर्नामेंट में भी वह पर्यवेक्षक के रूप में जुड़े रहे।पटियाला और पंजाब के खेल जगत में भी उनकी उपस्थिति दिखाई देती रही है। वर्ष 2024 में पटियाला में आयोजित एक इंटर-स्कूल बास्केटबॉल टूर्नामेंट में उन्होंने ओलंपियन के रूप में शिरकत की।
वर्ष 2014 में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के एक खेल समारोह में वह मुख्य अतिथि थे। इस अवसर पर उन्होंने विद्यार्थियों को शारीरिक व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली के महत्व के बारे में संबोधित किया।तरलोक सिंह संधू की कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी पहचान किसी एक मैच, एक अंक या एक पदक तक सीमित नहीं है। उस दौर में, जब भारत में बास्केटबॉल को आज जैसी सुविधाएं और मीडिया का ध्यान नहीं मिलता था, तब पंजाब के एक खिलाड़ी का दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।
उनकी 193 सेंटीमीटर की लंबाई, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और अंततः ओलंपिक में भारत की जर्सी पहनना पंजाब की खेल विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।आज जब पंजाब के युवा बास्केटबॉल, हॉकी और अन्य खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का प्रयास कर रहे हैं, तब तरलोक सिंह संधू जैसे पुराने ओलंपियनों की कहानियां उन्हें याद दिलाती हैं कि बड़े सपनों को साकार करने के लिए बड़े संसाधनों से पहले कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।
तरलोक सिंह संधू ने 1980 में मॉस्को की धरती पर भारत की बास्केटबॉल जर्सी पहनी थी। चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वह उपलब्धि भारतीय बास्केटबॉल के इतिहास का एक अनमोल अध्याय है—और उस अध्याय में पंजाब के इस ओलंपियन का नाम हमेशा दर्ज रहेगा।
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