27 हजार करोड़ का ‘हर्बल खजाना’; हिमाचल के जंगलों से बनेगी कमाई की नई राह, 11 औषधीय पौधों पर सरकार का फोकस
हरड़-बहेड़ा-आंवला समेत 11 प्रजातियों का होगा संरक्षण और वैज्ञानिक दोहन, ISB की रिसर्च के आधार पर सरकार ने बनाया मेगा प्लान
बाबूशाही ब्यूरो
शिमला 10 सितंबर 2026 : हिमाचल प्रदेश के जंगल अब सिर्फ हरियाली और पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को नई ताकत देने का जरिया भी बन सकते हैं। प्रदेश में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले 11 प्रमुख औषधीय पौधों से करीब 27 हजार करोड़ रुपये के कारोबार की संभावनाएं सामने आई हैं। सरकार ने इस ‘हर्बल इकोनॉमी’ को धरातल पर उतारने की तैयारी शुरू कर दी है।
देश के प्रतिष्ठित शोध संस्थान इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) ने हिमाचल के औषधीय पौधों की उपलब्धता और कारोबारी संभावनाओं को लेकर विस्तृत अध्ययन किया है। इसमें सरकारी आंकड़ों, सैटेलाइट डाटा और 500 से अधिक प्रशिक्षित वन रक्षकों की ओर से की गई जियो-टैगिंग व फोटोग्राफी को आधार बनाया गया। अध्ययन में चयनित 11 प्रजातियों से बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियां विकसित करने की संभावना सामने आई है।
रिसर्च से कारोबार तक, सरकार ने कसी कमर
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने इस संभावित बाजार को विकसित करने के लिए ISB के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) भी साइन किया है। अब वन विभाग और आयुष विभाग मिलकर औषधीय पौधों के संरक्षण, उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच बनाने की दिशा में काम करेंगे।
योजना में हरड़, बेहड़ा और आंवला जैसी औषधीय प्रजातियों के साथ आठ अन्य प्रजातियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इन पौधों को संरक्षित करने के साथ उनकी व्यवस्थित मार्केटिंग और व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को विकसित किया जाएगा।
जंगल से बाजार तक बनेगी पूरी चेन
सरकार का फोकस केवल औषधीय पौधों के संरक्षण तक सीमित नहीं है। इनकी उपलब्धता का वैज्ञानिक आकलन, संरक्षण, उत्पादन, वैल्यू एडिशन, प्रोसेसिंग और बाजार से जोड़ने की पूरी व्यवस्था विकसित करने की तैयारी है। इससे स्थानीय लोगों, किसानों और वन क्षेत्रों से जुड़े समुदायों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
जायका, केएफडब्ल्यू और आईडीपी परियोजनाओं से भी जोड़ा जाएगा
इस महत्वाकांक्षी पहल को हिमाचल में चल रही बड़ी विकास परियोजनाओं के साथ जोड़ने की भी तैयारी है। इनमें 800 करोड़ रुपये की जायका परियोजना, 310 करोड़ रुपये की केएफडब्ल्यू परियोजना और 700 करोड़ रुपये की आईडीपी परियोजना प्रमुख हैं।
सरकार की कोशिश है कि हिमाचल की प्राकृतिक संपदा को केवल कच्चे माल के रूप में बाहर भेजने के बजाय स्थानीय स्तर पर उसका मूल्यवर्धन और ब्रांडिंग की जाए। इससे प्रदेश की औषधीय पौधों पर आधारित अर्थव्यवस्था को नई पहचान मिलने की उम्मीद है। (SBP)
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