80 पदकों के साथ चीन शीर्ष पर; भारत 14 पदकों के साथ 13वें स्थान पर—मीराबाई चानू और रोशिबिना देवी ने जीते रजत, भारतीय खिलाड़ियों ने जोड़े पांच कांस्य
सुखमिंदर भंगू
लुधियाना, 24 सितंबर,2026ः किसी देश की खेल ताकत केवल उसकी आबादी, क्षेत्रफल या आर्थिक क्षमता से नहीं मापी जाती। असली तस्वीर मैदान में दिखाई देती है—खिलाड़ियों की प्रतिभा, प्रशिक्षण व्यवस्था, खेल सुविधाओं और युवा प्रतिभाओं को मिलने वाले अवसरों से।
आइची-नागोया एशियाई खेल 2026 में एशिया के खिलाड़ी अपने-अपने देशों के लिए पदक जीतने के लक्ष्य के साथ पूरी ताकत लगा रहे हैं।
पदक तालिका में चीन ने शानदार बढ़त बना रखी है। ताजा आंकड़ों के अनुसार चीन ने 50 स्वर्ण, 20 रजत और 10 कांस्य—कुल 80 पदक जीते हैं। भारत के खाते में 1 स्वर्ण, 6 रजत और 7 कांस्य—कुल 14 पदक हैं और वह 13वें स्थान पर है।
भारत के पदकों के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी
भारत के पदकों की संख्या भले ही देश की विशाल आबादी और संभावनाओं के अनुपात में दिखाई न दे, लेकिन प्रत्येक पदक के पीछे वर्षों की मेहनत, अनुशासन और त्याग छिपा है।
किसी खिलाड़ी की सफलता के पीछे सुबह-सुबह की ट्रेनिंग, आर्थिक कठिनाइयां, चोटें, सीमित सुविधाएं, परिवार का त्याग और वर्षों की कड़ी तैयारी होती है।
इसीलिए देश के लिए पदक जीतने वाले हर खिलाड़ी का सम्मान होना चाहिए।
ये खिलाड़ी केवल पोडियम पर खड़े नहीं होते, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए रास्ता भी तैयार करते हैं।
मीराबाई चानू ने 28 साल का इंतजार खत्म किया
भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मीराबाई चानू का रजत पदक रहा। उन्होंने महिलाओं के 49 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एशियाई खेलों में भारत का वेटलिफ्टिंग पदक का 28 साल का इंतजार समाप्त हुआ।
इससे पहले 1998 में कर्णम मल्लेश्वरी ने महिलाओं के 63 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता था।
ओलंपिक पदक विजेता मीराबाई चानू के लिए यह उपलब्धि उनके शानदार करियर में एक और महत्वपूर्ण अध्याय है।
रोशिबिना देवी का वुशू में शानदार प्रदर्शन
भारत की नाओरेम रोशिबिना देवी ने महिलाओं के 60 किलोग्राम सांडा वर्ग में रजत पदक जीता।
फाइनल में उन्हें चीन की झांग शियाओयू के हाथों 0-2 से हार का सामना करना पड़ा।
यह पदक एशियाई स्तर पर रोशिबिना की निरंतरता को दर्शाता है और भारतीय वुशू के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
रोइंग में सतनाम सिंह और सलमान खान का कांस्य
रोइंग के पुरुष डबल स्कल्स मुकाबले में
सतनाम सिंह और सलमान खान ने कांस्य पदक जीता।
भारतीय जोड़ी ने 6:13.25 का समय निकालकर तीसरा स्थान हासिल किया।
शूटिंग में भी भारत की मजबूत मौजूदगी
शूटिंग में भारत ने पदक तालिका में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
महिला स्कीट टीम में राइजा ढिल्लों, परीनाज़ धालीवाल और महेश्वरी चौहान ने कांस्य पदक जीता।
पुरुष स्कीट टीम में अनंतजीत सिंह नरूका, मेराज अहमद खान और भवतेघ सिंह गिल ने भी कांस्य पदक हासिल किया।
सॉफ्ट टेनिस में जय मीणा का कांस्य
जय मीणा ने पुरुष सिंगल्स सॉफ्ट टेनिस में कांस्य पदक जीतकर भारत के पदक अभियान में एक और उपलब्धि जोड़ी।
यह परिणाम इस बात का संकेत है कि भारतीय खिलाड़ी पारंपरिक खेलों के अलावा अन्य स्पर्धाओं में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
पदक सिर्फ धातु नहीं—एक पूरी कहानी है
भारत विशाल आबादी वाला देश है और यहां खेल प्रतिभा की कोई कमी नहीं। लेकिन इस प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय पदक में बदलने के लिए केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं है।
इसके लिए जमीनी स्तर पर खेल कार्यक्रम, स्कूलों में खेल संस्कृति, बेहतर मैदान, वैज्ञानिक कोचिंग, पोषण, स्पोर्ट्स मेडिसिन, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग और लंबे समय की योजना जरूरी है। हम अक्सर पूछते हैं कि छोटी आबादी वाले कुछ देश अंतरराष्ट्रीय खेलों में इतना अच्छा प्रदर्शन कैसे करते हैं।
यह सवाल हमें अपनी खेल व्यवस्था, प्रतिभा पहचान और खिलाड़ियों को मिलने वाली सहायता पर भी विचार करने का अवसर देता है।
लेकिन एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए—अंततः मैदान में उतरकर मुकाबला खिलाड़ी ही करता है।
इसलिए जब कोई भारतीय खिलाड़ी पदक जीतता है, तो केवल उसके गले में लटके पदक को मत देखिए। उस पदक के पीछे बहा वर्षों का पसीना भी देखिए।
उन खिलाड़ियों की जीवनियां पढ़िए। उनकी मुश्किलों को समझिए। उनके परिवार और कोच के त्याग को जानिए,क्योंकि पदक केवल धातु का एक टुकड़ा नहीं होता।
वह हजारों घंटों की मेहनत, अनुशासन, त्याग और संघर्ष का परिणाम होता है—और उस खिलाड़ी के हौसले की पहचान होता है जिसने मुश्किल रास्ते के बावजूद लड़ना नहीं छोड़ा।
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