गदरी बाबाओं के मुदई कनाडा वाले साहिब थिंद ने नायब सिंह सैनी से की मीटिंग
'पगड़ी संभाल जट्टा' लहर के अग्रणी देशभक्त लाला केदारनाथ सहगल की याद में यूनिवर्सिटी स्थापित करने की मांग
साहिब थिंद ने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से की विशेष मुलाकात
बलजीत बल्ली / बबूशाही नेटवर्क
चंडीगढ़, 28 अप्रैल 2026: पिछले दो दशकों से गदरी बाबाओं, बब्बर अकालियों और अन्य देशभक्तों की कुर्बानियों को याद रखने, संजोने और उन्हें उचित मान-सम्मान दिलाने के लिए विश्व स्तरीय लहर चला रहे, प्रो. मोहन सिंह मेमोरियल फाउंडेशन (कनाडा) के प्रमुख साहिब सिंह थिंद ने 27 अप्रैल को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से विशेष मुलाकात की। डॉ. प्रीतम सिंह डोड की पहल पर हरियाणा विधानसभा स्पीकर के चैंबर में हुई इस मीटिंग के दौरान स्पीकर हरविंदर कल्याण भी मौजूद थे।
मीटिंग के बाद साहिब थिंद ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के सौम्य स्वभाव और उनके द्वारा मामले को गंभीरता से सुनने की प्रशंसा की। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री ने मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने और आवश्यक कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है।
स्मरण रहे कि कई वर्षों से साहिब थिंद की पहल पर हर साल अगस्त महीने में सरी (कनाडा) में गदरी बाबाओं का मेला लगाया जाता है, जिसमें शहीदों और देशभक्तों के परिवारों को सम्मानित भी किया जाता है।

मुख्य मांगें:
साहिब थिंद ने हरियाणा सरकार को लिखित पत्र के माध्यम से मांग की है कि 'पगड़ी संभाल जट्टा' लहर के प्रमुख और देशभक्त लाला केदारनाथ सहगल की देश के लिए दी गई कुर्बानियों को मान्यता दी जाए। उन्होंने मांग की कि:
-
अंबाला में लाला केदारनाथ सहगल के नाम पर एक यूनिवर्सिटी कायम की जाए।
-
उनके स्वतंत्रता संग्राम को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के सिलेबस में शामिल किया जाए।
कौन थे लाला केदारनाथ सहगल?
साहिब थिंद ने बताया कि लाला केदारनाथ सहगल महज 11 साल की उम्र में आजादी की जंग में कूद पड़े थे और उन्होंने अपनी जिंदगी के 26 साल जेल में बिताए। वे शहीद-ए-आजम भगत सिंह के बहुत करीबी साथी थे। वे 1907 की 'पगड़ी संभाल जट्टा' लहर के अग्रणी थे और सरदार अजीत सिंह व सूफी अंबा प्रसाद जैसे नेताओं के साथ सक्रिय थे। 1928 में 'नौजवान भारत सभा' के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता भी उन्होंने ही की थी।
'स्याहपोश जनरल' की अनूठी देशभक्ति:
उन्हें 'स्याहपोश जनरल' (काले वस्त्र धारण करने वाले जनरल) के रूप में जाना जाता था। अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में उन्होंने प्रण लिया था कि जब तक देश आजाद नहीं होता, वे काले कपड़े ही पहनेंगे। आजादी के बाद भी वे इस प्रण पर कायम रहे और अपनी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका कफन भी काले रंग का ही था। 1963 में जब उनका देहांत हुआ, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, "एक सितारा, जो पिछले 50 वर्षों से देश के आकाश में चमक रहा था, वह आज टूट गया है।"
साहिब थिंद ने आशा व्यक्त की है कि हरियाणा सरकार अंबाला की इस महान शख्सियत को उचित सम्मान देकर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनाएगी।
- Download Babushahi Hindi App
-
-
Click to Follow हिन्दी बाबूशाही फेसबुक पेज →